श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.11.15

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

यो नोऽग्रजस्यात्मविदो द्विजाते-

र्गुरोरपापस्य च दीक्षितस्य।

विश्रभ्य खड्गेन शिरांस्यवृश्‍चत्

पशोरिवाकरुणः स्वर्गकामः॥ १५

yo no'grajasyātmavido dvijāte-

rgurorapāpasya ca dīkṣitasya|

viśrabhya khaḍgena śirāṃsyavṛścat

paśorivākaruṇaḥ svargakāmaḥ|| 15

अर्थ

इन्द्र! तूने मेरे आत्मवेत्ता और निष्पाप बड़े भाईके, जो ब्राह्मण होनेके साथ ही यज्ञमें दीक्षित और तुम्हारा गुरु था, विश्वास दिलाकर तलवारसे तीनों सिर उतार लिये—ठीक वैसे ही जैसे स्वर्गकामी निर्दय मनुष्य यज्ञमें पशुका सिर काट डालता है॥ १५॥

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