श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.11.13

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

स तं नृपेन्द्राहवकाम्यया रिपुं

वज्रायुधं भ्रातृहणं विलोक्य।

स्मरंश्‍च तत्कर्म नृशंसमंहः

शोकेन मोहेन हसञ्जगाद॥ १३

sa taṃ nṛpendrāhavakāmyayā ripuṃ

vajrāyudhaṃ bhrātṛhaṇaṃ vilokya|

smaraṃśca tatkarma nṛśaṃsamaṃhaḥ

śokena mohena hasañjagāda|| 13

अर्थ

परीक्षित्! जब वृत्रासुरने देखा कि मेरे भाई विश्‍वरूपका वध करनेवाला शत्रु इन्द्र युद्धके लिये हाथमें वज्र लेकर फिर सामने आ गया है, तब उसे उनके उस क्रूर पापकर्मका स्मरण हो आया और वह शोक और मोहसे युक्त हो हँसता हुआ उनसे कहने लगा॥ १३॥

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