श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.11.10

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

स इन्द्रशत्रुः कुपितो भृशं तया

महेन्द्रवाहं गदयोग्रविक्रमः।

जघान कुम्भस्थल उन्‍नदन् मृधे

तत्कर्म सर्वे समपूजयन्‍नृप॥ १०

sa indraśatruḥ kupito bhṛśaṃ tayā

mahendravāhaṃ gadayogravikramaḥ|

jaghāna kumbhasthala unnadan mṛdhe

tatkarma sarve samapūjayannṛpa|| 10

अर्थ

राजन्! परम पराक्रमी वृत्रासुरने क्रोधसे आग-बबूला होकर उसी गदासे इन्द्रके वाहन ऐरावतके सिरपर बड़े जोरसे गरजते हुए प्रहार किया। उसके इस कार्यकी सभी लोग बड़ी प्रशंसा करने लगे॥ १०॥

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