श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! असुरसेना भयभीत होकर भाग रही थी। उसके सैनिक इतने अचेत हो रहे थे कि उन्होंने अपने स्वामीके धर्मानुकूल वचनोंपर भी ध्यान न दिया॥ १॥
त एवं शंसतो धर्मं वचः पत्युरचेतसः।
नैवागृह्णन् भयत्रस्ताः पलायनपरा नृप॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! असुरसेना भयभीत होकर भाग रही थी। उसके सैनिक इतने अचेत हो रहे थे कि उन्होंने अपने स्वामीके धर्मानुकूल वचनोंपर भी ध्यान न दिया॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.11.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 757) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/11/1/