श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.10.18

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

दृष्ट्वा वज्रधरं शक्रं रोचमानं स्वया श्रिया।

नामृष्यन्‍नसुरा राजन् मृधे वृत्रपुरःसराः॥ १८

dṛṣṭvā vajradharaṃ śakraṃ rocamānaṃ svayā śriyā|

nāmṛṣyannasurā rājan mṛdhe vṛtrapuraḥsarāḥ|| 18

अर्थ

उस समय देवराज इन्द्र हाथमें वज्र लेकर रुद्र, वसु, आदित्य, दोनों अश्विनीकुमार, पितृगण, अग्‍नि, मरुद्गण, ऋभुगण, साध्यगण और विश्वेदेव आदिके साथ अपनी कान्तिसे शोभायमान हो रहे थे। वृत्रासुर आदि दैत्य उनको अपने सामने आया देख और भी चिढ़ गये॥ १७-१८॥

यह अर्थ श्लोक 17–18 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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