श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.10.12

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

यताक्षासुमनोबुद्धिस्तत्त्वदृग् ध्वस्तबन्धनः।

आस्थितः परमं योगं न देहं बुबुधे गतम्॥ १२

yatākṣāsumanobuddhistattvadṛg dhvastabandhanaḥ|

āsthitaḥ paramaṃ yogaṃ na dehaṃ bubudhe gatam|| 12

अर्थ

उनके इन्द्रिय, प्राण, मन और बुद्धि संयत थे, दृष्टि तत्त्वमयी थी, उनके सारे बन्धन कट चुके थे। अतः जब वे भगवान्‌से अत्यन्त युक्त होकर स्थित हो गये, तब उन्हें इस बातका पता ही न चला कि मेरा शरीर छूट गया॥ १२॥✎ 524 525

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #524 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #525 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् में → श्रीभगवान्‌में

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