कोई शरीरधारी जीव बिना कर्म किये कभी एक क्षण भी नहीं रह सकता। प्रत्येक प्राणीके स्वाभाविक गुण बलपूर्वक विवश करके उससे कर्म कराते हैं॥ ५३॥
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म गुणैः स्वाभाविकैर्बलात्॥ ५३
कोई शरीरधारी जीव बिना कर्म किये कभी एक क्षण भी नहीं रह सकता। प्रत्येक प्राणीके स्वाभाविक गुण बलपूर्वक विवश करके उससे कर्म कराते हैं॥ ५३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.1.53 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 701) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/1/53/