श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.42

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

सूर्योऽग्‍निः खं मरुद्गावः सोमः सन्ध्याहनी दिशः।

कं१ कुः कालो धर्म इति ह्येते दैह्यस्य साक्षिणः॥ ४२

sūryo'gniḥ khaṃ marudgāvaḥ somaḥ sandhyāhanī diśaḥ|

kaṃ kuḥ kālo dharma iti hyete daihyasya sākṣiṇaḥ|| 42

अर्थ

जीव शरीर अथवा मनोवृत्तियोंसे जितने कर्म करता है, उसके साक्षी रहते हैं—सूर्य, अग्‍नि, आकाश, वायु, इन्द्रियाँ, चन्द्रमा, सन्ध्या, रात, दिन, दिशाएँ, जल, पृथ्वी, काल और धर्म॥ ४२॥✎ 1949

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—कालः स्वयं धर्म इति।

    (मुद्रित पृष्ठ 700)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1949 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): मुनष्य → मनुष्य

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