॥ श्रीहरिः ॥
कथंस्विद् ध्रियते दण्डः किं वास्य स्थानमीप्सितम्।
दण्ड्याः किं कारिणः सर्वे आहोस्वित्कतिचिन्नृणाम्॥ ३९
kathaṃsvid dhriyate daṇḍaḥ kiṃ vāsya sthānamīpsitam|
daṇḍyāḥ kiṃ kāriṇaḥ sarve āhosvitkaticinnṛṇām|| 39
अर्थ
दण्ड किस प्रकार दिया जाता है? दण्डका पात्र कौन है? मनुष्योंमें सभी पापाचारी दण्डनीय हैं अथवा उनमेंसे कुछ ही?॥ ३९॥
कथंस्विद् ध्रियते दण्डः किं वास्य स्थानमीप्सितम्।
दण्ड्याः किं कारिणः सर्वे आहोस्वित्कतिचिन्नृणाम्॥ ३९
दण्ड किस प्रकार दिया जाता है? दण्डका पात्र कौन है? मनुष्योंमें सभी पापाचारी दण्डनीय हैं अथवा उनमेंसे कुछ ही?॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.1.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 699) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/1/39/