श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.22

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

बन्द्यक्षकैतवैश्चोर्यैर्गर्हितां वृत्तिमास्थितः।

बिभ्रत्कुटुम्बमशुचिर्यातयामास देहिनः॥ २२

bandyakṣakaitavaiścoryairgarhitāṃ vṛttimāsthitaḥ|

bibhratkuṭumbamaśuciryātayāmāsa dehinaḥ|| 22

अर्थ

वह पतित कभी बटोहियोंको बाँधकर उन्हें लूट लेता, कभी लोगोंको जूएके छलसे हरा देता, किसीका धन धोखा-धड़ीसे ले लेता तो किसीका चुरा लेता। इस प्रकार अत्यन्त निन्दनीय वृत्तिका आश्रय लेकर वह अपने कुटुम्बका पेट भरता था और दूसरे प्राणियोंको बहुत ही सताता था॥ २२॥

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