श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.12

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

नाश्नतः पथ्यमेवान्‍नं व्याधयोऽभिभवन्ति हि।

एवं नियमकृद्राजन् शनैः क्षेमाय कल्पते॥ १२

nāśnataḥ pathyamevānnaṃ vyādhayo'bhibhavanti hi|

evaṃ niyamakṛdrājan śanaiḥ kṣemāya kalpate|| 12

अर्थ

जो पुरुष केवल सुपथ्यका ही सेवन करता है, उसे रोग अपने वशमें नहीं कर सकते। वैसे ही परीक्षित्! जो पुरुष नियमोंका पालन करता है, वह धीरे-धीरे पापवासनाओंसे मुक्त हो कल्याणप्रद तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेमें समर्थ होता है॥ १२॥

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