श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.10

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

क्‍वचिन्‍निवर्ततेऽभद्रात्क्वचिच्चरति१ तत्पुनः।

प्रायश्चित्तमतोऽपार्थं मन्ये कुञ्जरशौचवत्॥ १०

kvacinnivartate'bhadrātkvaciccarati tatpunaḥ|

prāyaścittamato'pārthaṃ manye kuñjaraśaucavat|| 10

अर्थ

मनुष्य कभी तो प्रायश्चित्त आदिके द्वारा पापोंसे छुटकारा पा लेता है, कभी फिर उन्हें ही करने लगता है। ऐसी स्थितिमें मैं समझता हूँ कि जैसे स्नान करनेके बाद धूल डाल लेनेके कारण हाथीका स्नान व्यर्थ हो जाता है, वैसे ही मनुष्यका प्रायश्चित्त करना भी व्यर्थ ही है॥ १०॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—क्‍व वा चरति।

    (मुद्रित पृष्ठ 696)

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