श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.9.7

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

एवं स्वतनुज आत्मन्यनुरागावेशितचित्तः शौचाध्ययनव्रतनियमगुर्वनलशुश्रूषणाद्यौपकुर्वाणककर्माण्यनभियुक्तान्यपि समनुशिष्टेन भाव्यमित्यसदाग्रहः पुत्रमनुशास्य स्वयं तावदनधिगतमनोरथः कालेनाप्रमत्तेन स्वयं गृह एव प्रमत्त उपसंहृतः॥ ६॥ अथ यवीयसी द्विजसती स्वगर्भजातं मिथुनं सपत्‍न्या उपन्यस्य स्वयमनुसंस्थया पतिलोकमगात्॥ ७॥✎ 2013

atha yavīyasī dvijasatī svagarbhajātaṃ mithunaṃ sapatnyā upanyasya svayamanusaṃsthayā patilokamagāt|| 7||

अर्थ

तब उनकी छोटी भार्या अपने गर्भसे उत्पन्‍न हुए दोनों बालक अपनी सौतको सौंपकर स्वयं सती होकर पतिलोकको चली गयी॥ ७॥✎ 446

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #446 शब्दोंके बीचका स्थान: कालभगवान् ने → कालभगवान्‌ने
  • #2013 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): सपत्‍नॺा उप → सपत्‍न्या उप

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