tadānīmapi pārśvavartinamātmajamivānuśocantam abhivīkṣamāṇo mṛga evābhiniveśitamanā visṛjya lokamimaṃ saha mṛgeṇa kalevaraṃ mṛtamanu na mṛtajanmānusmṛtiritaravanmṛgaśarīramavāpa || 27||
अर्थ
उस समय भी वह हरिणशावक उनके पास बैठा पुत्रके समान शोकातुर हो रहा था। वे उसे इस स्थितिमें देख रहे थे और उनका चित्त उसीमें लग रहा था। इस प्रकारकी आसक्तिमें ही मृगके साथ उनका शरीर भी छूट गया। तदनन्तर उन्हें अन्तकालकी भावनाके अनुसार अन्य साधारण पुरुषोंके समान मृगशरीर ही मिला। किन्तु उनकी साधना पूरी थी, इससे उनकी पूर्वजन्मकी स्मृति नष्ट नहीं हुई॥ २७॥
तदानीमपि पार्श्ववर्तिनमात्मजमिवानुशोचन्तम् अभिवीक्षमाणो मृग एवाभिनिवेशितमना विसृज्य लोकमिमं सह मृगेण कलेवरं मृतमनु न मृतजन्मानुस्मृतिरितरवन्मृगशरीरमवाप ॥ २७॥
उस समय भी वह हरिणशावक उनके पास बैठा पुत्रके समान शोकातुर हो रहा था। वे उसे इस स्थितिमें देख रहे थे और उनका चित्त उसीमें लग रहा था। इस प्रकारकी आसक्तिमें ही मृगके साथ उनका शरीर भी छूट गया। तदनन्तर उन्हें अन्तकालकी भावनाके अनुसार अन्य साधारण पुरुषोंके समान मृगशरीर ही मिला। किन्तु उनकी साधना पूरी थी, इससे उनकी पूर्वजन्मकी स्मृति नष्ट नहीं हुई॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.8.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 609) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/8/27/