श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.8.10

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

अहो बतायं हरिणकुणकः कृपण ईश्‍वररथचरणपरिभ्रमणरयेण स्वगणसुहृद‍्बन्धुभ्यः परिवर्जितः शरणं च मोपसादितो मामेव मातापितरौ भ्रातृज्ञातीन् यौथिकांश्चैवोपेयाय नान्यं कञ्चन वेद मय्यतिविस्रब्धश्चात एव मया मत्परायणस्य पोषणपालनप्रीणनलालनमनसूयुनानुष्ठेयं शरण्योपेक्षादोषविदुषा॥ ९॥ नूनं ह्यार्याः साधव उपशमशीलाः कृपणसुहृद‍् एवंविधार्थे स्वार्थानपि गुरुतरानुपेक्षन्ते॥ १०॥

nūnaṃ hyāryāḥ sādhava upaśamaśīlāḥ kṛpaṇasuhṛd evaṃvidhārthe svārthānapi gurutarānupekṣante|| 10||

अर्थ

निश्‍चय ही शान्तस्वभाव और दीनोंकी रक्षा करनेवाले परोपकारी सज्जन ऐसे शरणागतकी रक्षाके लिये अपने बड़े-से-बड़े स्वार्थकी भी परवा नहीं करते’॥ १०॥✎ 1916 1957

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1916 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): शान्त-स्वभाव → शान्तस्वभाव
  • #1957 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): परवाह → परवा

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