इस पुलहाश्रममें रहनेवाले भक्तोंपर भगवान्का बड़ा ही वात्सल्य है। वे आज भी उनसे उनके इष्टरूपमें मिलते रहते हैं॥ ९॥
यत्र ह वाव भगवान् हरिरद्यापि तत्रत्यानां निजजनानां वात्सल्येन संनिधाप्यत इच्छारूपेण॥ ९॥
इस पुलहाश्रममें रहनेवाले भक्तोंपर भगवान्का बड़ा ही वात्सल्य है। वे आज भी उनसे उनके इष्टरूपमें मिलते रहते हैं॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.7.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 604) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/7/9/