श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.7.14

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

परोरजः सवितुर्जातवेदो

देवस्य भर्गो मनसेदं जजान।

सुरेतसादः पुनराविश्य चष्टे

हंसं गृध्राणं नृषद्रिङ्गिरामिमः॥ १४

parorajaḥ saviturjātavedo

devasya bhargo manasedaṃ jajāna|

suretasādaḥ punarāviśya caṣṭe

haṃsaṃ gṛdhrāṇaṃ nṛṣadriṅgirāmimaḥ|| 14

अर्थ

‘भगवान् सूर्यका कर्मफलदायक तेज प्रकृतिसे परे है। उसीने संकल्पद्वारा इस जगत‍्की उत्पत्ति की है। फिर वही अन्तर्यामीरूपसे इसमें प्रविष्ट होकर अपनी चित्-शक्तिद्वारा विषयलोलुप जीवोंकी रक्षा करता है। हम उसी बुद्धिप्रवर्त्तक तेजकी शरण लेते हैं’॥ १४॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे
भरतचरिते भगवत्परिचर्यायां सप्तमोऽध्यायः
॥ ७॥

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