श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.6.8

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

तस्य ह वा एवं मुक्तलिङ्गस्य भगवत ऋषभस्य योगमायावासनया देह इमां जगतीमभिमानाभासेन संक्रममाणः कोङ्कवेङ्ककुटकान्दक्षिणकर्णाटकान्देशान् यदृच्छयोपगतः कुटकाचलोपवन आस्यकृताश्मकवल उन्माद इव मुक्तमूर्धजोऽसंवीत एव विचचार॥ ७॥
अथ समीरवेगविधूतवेणुविकर्षणजातोग्रदावानलस्तद्वनमालेलिहानः सह तेन ददाह॥ ८॥✎ 931

atha samīravegavidhūtaveṇuvikarṣaṇajātogradāvānalastadvanamālelihānaḥ saha tena dadāha|| 8||

अर्थ

इसी समय झंझावातसे झकझोरे हुए बाँसोंके घर्षणसे प्रबल दावाग्‍नि धधक उठी और उसने सारे वनको अपनी लाल-लाल लपटोंमें लेकर ऋषभदेवजीके सहित भस्म कर दिया॥ ८॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #931 शब्दोंके बीचका स्थान: संक्रममाण:कोङ्कवेङ्ककुटकान्दक्षिणकर्णाटकान्देशान् → संक्रममाणः कोङ्कवेङ्ककुटकान्दक्षिणकर्णाटकान्देशान्

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