yadviśrambhāccirāccīrṇaṃ caskanda tapa aiśvaram|| 3
अर्थ
ऐसा ही कहा भी है—‘इस चंचल चित्तसे कभी मैत्री नहीं करनी चाहिये। इसमें विश्वास करनेसे ही मोहिनीरूपमें फँसकर महादेवजीका चिरकालका संचित तप क्षीण हो गया था॥ ३॥
तथा चोक्तम्—
न कुर्यात्कर्हिचित्सख्यं मनसि ह्यनवस्थिते।
यद्विश्रम्भाच्चिराच्चीर्णं चस्कन्द तप ऐश्वरम्॥ ३
ऐसा ही कहा भी है—‘इस चंचल चित्तसे कभी मैत्री नहीं करनी चाहिये। इसमें विश्वास करनेसे ही मोहिनीरूपमें फँसकर महादेवजीका चिरकालका संचित तप क्षीण हो गया था॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.6.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 600) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/6/3/