श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.6.1

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

अथ षष्ठोऽध्यायः

ऋषभदेवजीका देहत्याग

राजोवाच

न नूनं भगव आत्मारामाणां योगसमीरितज्ञानावभर्जितकर्मबीजानामैश्‍वर्याणि पुनः क्लेशदानि भवितुमर्हन्ति यदृच्छयोपगतानि॥ १॥

na nūnaṃ bhagava ātmārāmāṇāṃ yogasamīritajñānāvabharjitakarmabījānāmaiśvaryāṇi punaḥ kleśadāni bhavitumarhanti yadṛcchayopagatāni|| 1||

अर्थ

राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! योगरूप वायुसे प्रज्वलित हुई ज्ञानाग्‍निसे जिनके रागादि कर्मबीज दग्ध हो गये हैं—उन आत्माराम मुनियोंको दैववश यदि स्वयं ही अणिमादि सिद्धियाँ प्राप्त हो जायँ, तो वे उनके राग-द्वेषादि क्लेशोंका कारण तो किसी प्रकार हो नहीं सकतीं। फिर भगवान् ऋषभने उन्हें स्वीकार क्यों नहीं किया?॥ १॥

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