॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.5.4
नूनं प्रमत्तः कुरुते विकर्म
यदिन्द्रियप्रीतय आपृणोति।
न साधु मन्ये यत आत्मनोऽय-
मसन्नपि क्लेशद आस देहः॥ ४
nūnaṃ pramattaḥ kurute vikarma
yadindriyaprītaya āpṛṇoti|
na sādhu manye yata ātmano'ya-
masannapi kleśada āsa dehaḥ|| 4
अर्थ
मनुष्य अवश्य प्रमादवश कुकर्म करने लगता है, उसकी वह प्रवृत्ति इन्द्रियोंको तृप्त करनेके लिये ही होती है। मैं इसे अच्छा नहीं समझता, क्योंकि इसीके कारण आत्माको यह असत् और दुःखदायक शरीर प्राप्त होता है॥ ४॥