॥ श्रीहरिः ॥
अथानयापि न भवत इज्ययोरुभारभरया समुचितमर्थमिहोपलभामहे॥ ७॥
athānayāpi na bhavata ijyayorubhārabharayā samucitamarthamihopalabhāmahe|| 7||
अर्थ
हमें तो अनुरागके सिवा इस द्रव्य-कालादि अनेकों अंगोंवाले यज्ञसे भी आपका कोई प्रयोजन नहीं दिखलायी देता;॥ ७॥
अथानयापि न भवत इज्ययोरुभारभरया समुचितमर्थमिहोपलभामहे॥ ७॥
हमें तो अनुरागके सिवा इस द्रव्य-कालादि अनेकों अंगोंवाले यज्ञसे भी आपका कोई प्रयोजन नहीं दिखलायी देता;॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.3.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 588) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/3/7/