श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.3.18

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

तत आग्नीध्रीयेंऽशकलयावतरिष्यामि आत्मतुल्यमनुपलभमानः॥ १८॥

tata āgnīdhrīyeṃ'śakalayāvatariṣyāmi ātmatulyamanupalabhamānaḥ|| 18||

अर्थ

इसलिये मैं स्वयं ही अपनी अंशकलासे आग्नीध्रनन्दन नाभिके यहाँ अवतार लूँगा, क्योंकि अपने समान मुझे कोई और दिखायी नहीं देता॥ १८॥

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