श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! वर्षाधिपति नाभिके पूज्य ऋत्विजोंने प्रभुके चरणोंकी वन्दना करके जब पूर्वोक्त स्तोत्रसे स्तुति की, तब देवश्रेष्ठ श्रीहरिने करुणावश इस प्रकार कहा॥ १६॥
इति निगदेनाभिष्टूयमानो भगवान् अनिमिषर्षभो वर्षधराभिवादिताभिवन्दितचरणः सदयमिदमाह॥ १६॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! वर्षाधिपति नाभिके पूज्य ऋत्विजोंने प्रभुके चरणोंकी वन्दना करके जब पूर्वोक्त स्तोत्रसे स्तुति की, तब देवश्रेष्ठ श्रीहरिने करुणावश इस प्रकार कहा॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.3.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 589) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/3/16/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)