॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.3.12
अथ कथञ्चित्स्खलनक्षुत्पतनजृम्भणदुरवस्थानादिषु विवशानां नः स्मरणाय ज्वरमरणदशायामपि सकलकश्मलनिरसनानि तव गुणकृतनामधेयानि वचनगोचराणि भवन्तु॥ १२॥
atha kathañcitskhalanakṣutpatanajṛmbhaṇaduravasthānādiṣu vivaśānāṃ naḥ smaraṇāya jvaramaraṇadaśāyāmapi sakalakaśmalanirasanāni tava guṇakṛtanāmadheyāni vacanagocarāṇi bhavantu|| 12||
अर्थ
अतः हम आपसे यही वर माँगते हैं कि गिरने, ठोकर खाने, छींकने अथवा जँभाई लेने और संकटादिके समय एवं ज्वर और मरणादिकी अवस्थाओंमें आपका स्मरण न हो सकनेपर भी किसी प्रकार आपके सकलकलिमल-विनाशक ‘भक्तवत्सल’, ‘दीनबन्धु’ आदि गुणद्योतक नामोंका हम उच्चारण कर सकें॥ १२॥