श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.3.12

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

अथ कथञ्चित्स्खलनक्षुत्पतनजृम्भणदुरवस्थानादिषु विवशानां नः स्मरणाय ज्वरमरणदशायामपि सकलकश्मलनिरसनानि तव गुणकृतनामधेयानि वचनगोचराणि भवन्तु॥ १२॥

atha kathañcitskhalanakṣutpatanajṛmbhaṇaduravasthānādiṣu vivaśānāṃ naḥ smaraṇāya jvaramaraṇadaśāyāmapi sakalakaśmalanirasanāni tava guṇakṛtanāmadheyāni vacanagocarāṇi bhavantu|| 12||

अर्थ

अतः हम आपसे यही वर माँगते हैं कि गिरने, ठोकर खाने, छींकने अथवा जँभाई लेने और संकटादिके समय एवं ज्वर और मरणादिकी अवस्थाओंमें आपका स्मरण न हो सकनेपर भी किसी प्रकार आपके सकलकलिमल-विनाशक ‘भक्तवत्सल’, ‘दीनबन्धु’ आदि गुणद्योतक नामोंका हम उच्चारण कर सकें॥ १२॥

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