॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.26.35
ये त्विह वा अन्धावटकुसूलगुहादिषु भूतानि निरुन्धन्ति तथामुत्र तेष्वेवोपवेश्य सगरेण वह्निना धूमेन निरुन्धन्ति॥ ३४॥ यस्त्विह वा अतिथीनभ्यागतान् वा गृहपतिरसकृदुपगतमन्युर्दिधक्षुरिव पापेन चक्षुषा निरीक्षते तस्य चापि निरये पापदृष्टेरक्षिणी वज्रतुण्डा गृध्राः कङ्ककाकवटादयः प्रसह्योरुबलादुत्पाटयन्ति॥ ३५॥
yastviha vā atithīnabhyāgatān vā gṛhapatirasakṛdupagatamanyurdidhakṣuriva pāpena cakṣuṣā nirīkṣate tasya cāpi niraye pāpadṛṣṭerakṣiṇī vajratuṇḍā gṛdhrāḥ kaṅkakākavaṭādayaḥ prasahyorubalādutpāṭayanti|| 35||
अर्थ
जो गृहस्थ अपने घर आये अतिथि-अभ्यागतोंकी ओर बार-बार क्रोधमें भरकर ऐसी कुटिल दृष्टिसे देखता है मानो उन्हें भस्म कर देगा, वह जब नरकमें जाता है, तब उस पापदृष्टिके नेत्रोंको गिद्ध, कंक, काक और बटेर आदि वज्रकी-सी कठोर चोंचोंवाले पक्षी बलात् निकाल लेते हैं। इस नरकको पर्यावर्तन कहते हैं॥ ३५॥✎ 1947