श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.26.30

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

अथ च यस्त्विह१ वा आत्मसम्भावनेन स्वयमधमो जन्मतपोविद्याचारवर्णाश्रमवतो वरीयसो न बहु मन्येत स मृतक एव मृत्वा क्षारकर्दमे निरयेऽवाक्शिरा निपातितो दुरन्ता यातना ह्यश्नुते॥ ३०॥

atha ca yastviha vā ātmasambhāvanena svayamadhamo janmatapovidyācāravarṇāśramavato varīyaso na bahu manyeta sa mṛtaka eva mṛtvā kṣārakardame niraye'vākśirā nipātito durantā yātanā hyaśnute|| 30||

अर्थ

जो पुरुष इस लोकमें निम्न श्रेणीका होकर भी अपनेको बड़ा माननेके कारण जन्म, तप, विद्या, आचार, वर्ण या आश्रममें अपनेसे बड़ोंका विशेष सत्कार नहीं करता, वह जीता हुआ भी मरेके ही समान है। उसे मरनेपर क्षारकर्दम नामके नरकमें नीचेको सिर करके गिराया जाता है और वहाँ उसे अनन्त पीड़ाएँ भोगनी पड़ती हैं॥ ३०॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—यस्त्विहात्मसंभावनेन।

    (मुद्रित पृष्ठ 692)

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