॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.26.23
ये त्विह वै राजन्या राजपुरुषा वा अपाखण्डा धर्मसेतून्५ भिन्दन्ति ते सम्परेत्य वैतरण्यां निपतन्ति भिन्नमर्यादास्तस्यां निरयपरिखाभूतायां नद्यां यादोगणैरितस्ततो भक्ष्यमाणा आत्मना न वियुज्यमानाश्चासुभिरुह्यमानाः स्वाघेन कर्मपाकमनुस्मरन्तो विण्मूत्रपूयशोणितकेशनखास्थिमेदोमांसवसावाहिन्यामुपतप्यन्ते॥ २२॥ ये त्विह वै वृषलीपतयो नष्टशौचाचारनियमास्त्यक्तलज्जाः पशुचर्यां चरन्ति ते चापि प्रेत्य पूयविण्मूत्रश्लेष्ममलापूर्णार्णवे निपतन्ति तदेवातिबीभत्सितमश्नन्ति॥ २३॥
ye tviha vai vṛṣalīpatayo naṣṭaśaucācāraniyamāstyaktalajjāḥ paśucaryāṃ caranti te cāpi pretya pūyaviṇmūtraśleṣmamalāpūrṇārṇave nipatanti tadevātibībhatsitamaśnanti|| 23||
अर्थ
जो लोग शौच और आचारके नियमोंका परित्याग कर तथा लज्जाको तिलांजलि देकर इस लोकमें शूद्राओंके साथ सम्बन्ध गाँठकर पशुओंके समान आचरण करते हैं, वे भी मरनेके बाद पीब, विष्ठा, मूत्र, कफ और मलसे भरे हुए पूयोद नामक समुद्रमें गिरकर उन अत्यन्त घृणित वस्तुओंको ही खाते हैं॥ २३॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—धर्मसेतुं।