॥ श्रीहरिः ॥
अथ षड्विंशोऽध्यायः
नरकोंकी विभिन्न गतियोंका वर्णन
राजोवाच
महर्ष एतद्वैचित्र्यं लोकस्य कथमिति॥ १॥
maharṣa etadvaicitryaṃ lokasya kathamiti|| 1||
अर्थ
राजा परीक्षित्ने पूछा—महर्षे! लोगोंको जो ये ऊँची-नीची गतियाँ प्राप्त होती हैं, उनमें इतनी विभिन्नता क्यों है?॥ १॥
महर्ष एतद्वैचित्र्यं लोकस्य कथमिति॥ १॥
राजा परीक्षित्ने पूछा—महर्षे! लोगोंको जो ये ऊँची-नीची गतियाँ प्राप्त होती हैं, उनमें इतनी विभिन्नता क्यों है?॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.26.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 686) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/26/1/