वास्तवमें उनके वीर्य, अतिशय गुण और प्रभाव असीम हैं। ऐसे प्रभावशाली भगवान् अनन्त रसातलके मूलमें अपनी ही महिमामें स्थित स्वतन्त्र हैं और सम्पूर्ण लोकोंकी स्थितिके लिये लीलासे ही पृथ्वीको धारण किये हुए हैं॥ १३॥✎ 485486
एवम्प्रभावो भगवाननन्तो
दुरन्तवीर्योरुगुणानुभावः ।
मूले रसायाः स्थित आत्मतन्त्रो
यो लीलया क्ष्मां स्थितये बिभर्ति॥ १३
वास्तवमें उनके वीर्य, अतिशय गुण और प्रभाव असीम हैं। ऐसे प्रभावशाली भगवान् अनन्त रसातलके मूलमें अपनी ही महिमामें स्थित स्वतन्त्र हैं और सम्पूर्ण लोकोंकी स्थितिके लिये लीलासे ही पृथ्वीको धारण किये हुए हैं॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.25.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 685) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/25/13/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#485 शब्दोंके बीचका स्थान: शेषभगवान् को → शेषभगवान्को