yasyānudāsyamevāsmatpitāmahaḥ kila vavre na tu svapitryaṃ yadutākutobhayaṃ padaṃ dīyamānaṃ bhagavataḥ paramiti bhagavatoparate khalu svapitari|| 25||
अर्थ
हमारे पितामह प्रह्लादजीने—भगवान्के हाथों अपने पिता हिरण्यकशिपुके मारे जानेपर—प्रभुकी सेवाका ही वर माँगा था। भगवान् देना भी चाहते थे, तो भी उनसे दूर करनेवाला समझकर उन्होंने अपने पिताका निष्कण्टक राज्य लेना स्वीकार नहीं किया॥ २५॥✎ 481482483
यस्यानुदास्यमेवास्मत्पितामहः किल वव्रे न तु स्वपित्र्यं यदुताकुतोभयं पदं दीयमानं भगवतः परमिति भगवतोपरते खलु स्वपितरि॥ २५॥
हमारे पितामह प्रह्लादजीने—भगवान्के हाथों अपने पिता हिरण्यकशिपुके मारे जानेपर—प्रभुकी सेवाका ही वर माँगा था। भगवान् देना भी चाहते थे, तो भी उनसे दूर करनेवाला समझकर उन्होंने अपने पिताका निष्कण्टक राज्य लेना स्वीकार नहीं किया॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.24.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 681) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/24/25/