अनुक्रमणिका पञ्चम स्कन्ध अध्याय 24 श्लोक 22 ॥ श्रीहरिः ॥
ततोऽधस्तात्सुतले उदारश्रवाः पुण्यश्लोको विरोचनात्मजो बलिर्भगवता महेन्द्रस्य प्रियं चिकीर्षमाणेनादितेर्लब्धकायो भूत्वा वटुवामनरूपेण पराक्षिप्तलोकत्रयो१ भगवदनुकम्पयैव पुनः प्रवेशित इन्द्रादिष्वविद्यमानया सुसमृद्धया श्रियाभिजुष्टः स्वधर्मेणाराधयंस्तमेवभगवन्तमाराधनीयमपगतसाध्वस आस्तेऽधुनापि॥ १८॥ नो एवैतत्साक्षात्कारो२ भूमिदानस्य यत्तद्भगवत्यशेषजीवनिकायानां जीवभूतात्मभूते परमात्मनि वासुदेव तीर्थतमे पात्र उपपन्ने परया श्रद्धया परमादरसमाहितमनसा सम्प्रतिपादितस्य साक्षादपवर्गद्वारस्य यद्बिलनिलयैश्वर्यम्॥ १९॥ यस्य ह वाव क्षुतपतनप्रस्खलनादिषु विवशः सकृन्नामाभिगृणन् पुरुषः कर्मबन्धनमञ्जसा विधुनोति यस्य हैव प्रतिबाधनं मुमुक्षवोऽन्यथैवोपलभन्ते३ ॥ २०॥ तद्भक्तानामात्मवतां सर्वेषामात्मन्यात्मद आत्मतयैव॥ २१॥ न वै भगवान्नूनममुष्या नुजग्राह यदुत पुनरात्मानुस्मृतिमोषणं मायामयभोगैश्वर्यमेवातनुतेति॥ २२॥ यत्तद् भगवतानधिगतान्योपायेन याच्ञाच्छलेनापहृतस्वशरीरावशेषितलोकत्रयो वरुणपाशैश्च सम्प्रतिमुक्तो गिरिदर्यां चापविद्ध इति होवाच॥ २३॥✎ 1941 2218 2219 2220
na vai bhagavānnūnamamuṣyā nujagrāha yaduta punarātmānusmṛtimoṣaṇaṃ māyāmayabhogaiśvaryamevātanuteti|| 22||
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भगवान्ने यदि बलिको उसके सर्वस्वदानके बदले अपनी विस्मृति करानेवाला यह मायामय भोग और ऐश्वर्य ही दिया तो उन्होंने उसपर यह कोई अनुग्रह नहीं किया॥ २२॥✎ 476 477 478 479 480
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न वै भगवान्नूनममुष्या नुजग्राह यदुत पुनरात्मानुस्मृतिमोषणं मायामयभोगैश्वर्यमेवातनुतेति॥ २२॥
भगवान्ने यदि बलिको उसके सर्वस्वदानके बदले अपनी विस्मृति करानेवाला यह मायामय भोग और ऐश्वर्य ही दिया तो उन्होंने उसपर यह कोई अनुग्रह नहीं किया॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.24.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 680) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/24/22/ टिप्पणियाँ १ प्रा० पा०—परिक्षिप्तस्वर्लोकत्रयो।
(मुद्रित पृष्ठ 680) २ प्रा० पा०—यद्येतत्साक्षात्कारो।
(मुद्रित पृष्ठ 680) ३ प्रा० पा०—ऽन्यथेवेहोप०।
(मुद्रित पृष्ठ 680) इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (9) #476 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्ने #477 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्ने #478 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्को #479 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की #480 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्ने #1941 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): क्षुत्पतन → क्षुतपतन #2218 टिप्पणी: → प्रा० पा०—परिक्षिप्तस्वर्लोकत्रयो। #2219 टिप्पणी: → प्रा० पा०—यद्येतत्साक्षात्कारो। #2220 टिप्पणी: → प्रा० पा०—ऽन्यथेवेहोप०।