॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.24.12
यत्र हि महाहिप्रवरशिरोमणयः सर्वं तमः प्रबाधन्ते॥ १२॥
yatra hi mahāhipravaraśiromaṇayaḥ sarvaṃ tamaḥ prabādhante|| 12||
अर्थ
वहाँके सम्पूर्ण अन्धकारको बड़े-बड़े नागोंके मस्तकोंकी मणियाँ ही दूर करती हैं॥ १२॥
॥ श्रीहरिः ॥
यत्र हि महाहिप्रवरशिरोमणयः सर्वं तमः प्रबाधन्ते॥ १२॥
yatra hi mahāhipravaraśiromaṇayaḥ sarvaṃ tamaḥ prabādhante|| 12||
वहाँके सम्पूर्ण अन्धकारको बड़े-बड़े नागोंके मस्तकोंकी मणियाँ ही दूर करती हैं॥ १२॥