श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.23.9

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

ग्रहर्क्षतारामयमाधिदैविकं

पापापहं मन्त्रकृतां त्रिकालम्।

नमस्यतः स्मरतो वा त्रिकालं

नश्येत तत्कालजमाशु पापम्॥ ९

graharkṣatārāmayamādhidaivikaṃ

pāpāpahaṃ mantrakṛtāṃ trikālam|

namasyataḥ smarato vā trikālaṃ

naśyeta tatkālajamāśu pāpam|| 9

अर्थ

ग्रह, नक्षत्र और ताराओंके रूपमें भगवान्का आधिदैविकरूप प्रकाशित हो रहा है; वह तीनों समय उपर्युक्त मन्त्रका जप करनेवाले पुरुषोंके पाप नष्ट कर देता है। जो पुरुष प्रातः, मध्याह्न और सायं—तीनों काल उनके इस आधिदैविक स्वरूपका नित्यप्रति चिन्तन और वन्दन करता है, उसके उस समय किये हुए पाप तुरन्त नष्ट हो जाते हैं॥ ९॥✎ 473

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे
शिशुमारसंस्थावर्णनं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः
॥ २३॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #473 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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