sa hi sarveṣāṃ jyotirgaṇānāṃ grahanakṣatrādīnāmanimiṣeṇāvyaktaraṃhasābhagavatā kālena bhrāmyamāṇānāṃ sthāṇurivāvaṣṭambha īśvareṇa vihitaḥ śaśvadavabhāsate|| 2||
अर्थ
सदा जागते रहनेवाले अव्यक्तगति भगवान् कालके द्वारा जो ग्रह-नक्षत्रादि ज्योतिर्गण निरन्तर घुमाये जाते हैं, भगवान्ने ध्रुवलोकको ही उन सबके आधारस्तम्भरूपसे नियुक्त किया है। अतः यह एक ही स्थानमें रहकर सदा प्रकाशित होता है॥ २॥✎ 471
स हि सर्वेषां ज्योतिर्गणानां ग्रहनक्षत्रादीनामनिमिषेणाव्यक्तरंहसाभगवता कालेन भ्राम्यमाणानां स्थाणुरिवावष्टम्भ ईश्वरेण विहितः शश्वदवभासते॥ २॥
सदा जागते रहनेवाले अव्यक्तगति भगवान् कालके द्वारा जो ग्रह-नक्षत्रादि ज्योतिर्गण निरन्तर घुमाये जाते हैं, भगवान्ने ध्रुवलोकको ही उन सबके आधारस्तम्भरूपसे नियुक्त किया है। अतः यह एक ही स्थानमें रहकर सदा प्रकाशित होता है॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.23.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 674) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/23/2/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)