श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.22.6

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

स एष भगवानादिपुरुष एव साक्षान्‍नारायणो लोकानां स्वस्तय आत्मानं त्रयीमयं कर्मविशुद्धिनिमित्तं कविभिरपि च वेदेन विजिज्ञास्यमानो द्वादशधा विभज्य षट्सु वसन्तादिष्वृतुषु यथोपजोषमृतुगुणान् विदधाति ॥ ३॥ तमेतमिह पुरुषास्त्रय्या विद्यया वर्णाश्रमाचारानुपथा उच्चावचैः कर्मभिराम्नातैर्योगवितानैश्‍च श्रद्धया यजन्तोऽञ्जसा श्रेयः समधिगच्छन्ति॥ ४॥ अथ स एष आत्मा लोकानां द्यावापृथिव्योरन्तरेण नभोवलयस्य कालचक्रगतो द्वादश मासान् भुङ्क्ते राशिसंज्ञान् संवत्सरावयवान्मासः पक्षद्वयं दिवा नक्तं चेति सपादर्क्षद्वयमुपदिशन्ति यावता षष्ठमंशं भुञ्जीत स वै ऋतुरित्युपदिश्यते संवत्सरावयवः॥ ५॥ अथ च यावतार्धेन नभोवीथ्यां प्रचरति तं कालमयनमाचक्षते॥ ६॥ अथ च यावन्‍नभोमण्डलं स ह द्यावापृथिव्योर्मण्डलाभ्यां कार्त्स्न्येन सह भुञ्जीत तं कालं संवत्सरं परिवत्सरमिडावत्सरमनुवत्सरं वत्सरमिति भानोर्मान्द्यशैघ्र्यसमगतिभिः समामनन्ति॥ ७॥✎ 951

atha ca yāvatārdhena nabhovīthyāṃ pracarati taṃ kālamayanamācakṣate|| 6||

अर्थ

आकाशमें भगवान् सूर्यका जितना मार्ग है, उसका आधा वे जितने समयमें पार कर लेते हैं, उसे एक ‘अयन’ कहते हैं॥ ६॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #951 शब्दोंके बीचका स्थान: कालमयनमाचक्षते॥६॥ → कालमयनमाचक्षते॥ ६॥

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