श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.20.8

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

प्लक्षः स्वसमानेनेक्षुरसोदेनावृतो यथा तथा द्वीपोऽपि शाल्मलो द्विगुणविशालः समानेन सुरोदेनावृतः परिवृङ्क्ते॥ ७॥ यत्र ह वै शाल्मली प्लक्षायामा यस्यां वाव किल निलयमाहुर्भगवतश्छन्दःस्तुतः पतत्त्रिराजस्य सा द्वीपहूतये उपलक्ष्यते॥ ८॥ तद‍्द्वीपाधिपतिः प्रियव्रतात्मजो यज्ञबाहुः स्वसुतेभ्यः सप्तभ्यस्तन्‍नामानि सप्तवर्षाणि व्यभजत्सुरोचनं सौमनस्यं रमणकं देववर्षं पारिभद्रमाप्यायनमविज्ञातमिति॥ ९॥ तेषु वर्षाद्रयो नद्यश्‍च सप्तैवाभिज्ञाताः स्वरसः शतशृङ्गो वामदेवः कुन्दो मुकुन्दः पुष्पवर्षः सहस्रश्रुतिरिति। अनुमतिः सिनीवाली सरस्वती कुहू रजनी नन्दा राकेति॥ १०॥ तद्वर्षपुरुषाः श्रुतधरवीर्यधरवसुन्धरेषन्धरसंज्ञा भगवन्तं वेदमयं सोममात्मानं वेदेन यजन्ते॥ ११॥

yatra ha vai śālmalī plakṣāyāmā yasyāṃ vāva kila nilayamāhurbhagavataśchandaḥstutaḥ patattrirājasya sā dvīpahūtaye upalakṣyate|| 8||

अर्थ

प्लक्षद्वीपके पाकरके पेड़के बराबर उसमें शाल्मली (सेमर)-का वृक्ष है। कहते हैं, यही वृक्ष अपने वेदमय पंखोंसे भगवान्‌की स्तुति करनेवाले पक्षिराज भगवान् गरुडका निवासस्थान है तथा यही इस द्वीपके नामकरणका भी हेतु है॥ ८॥✎ 468

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #468 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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