श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.20.29

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

एवमेव दधिमण्डोदात्परतः पुष्करद्वीपस्ततो द्विगुणायामः समन्तत उपकल्पितः समानेन स्वादूदकेन१ समुद्रेण बहिरावृतो यस्मिन् बृहत्पुष्करं२ ज्वलनशिखामलकनकपत्रायुतायुतं भगवतः कमलासनस्याध्यासनं परिकल्पितम्॥ २९॥ तद‍्द्वीपमध्ये मानसोत्तरनामैक३ ४एवार्वाचीनपराचीनवर्षयोर्मर्यादाचलोऽयुतयोजनोच्छ्रायायामो यत्र तु चतसृषु दिक्षु चत्वारि पुराणि लोकपालानामिन्द्रादीनां यदुपरिष्टात्सूर्यरथस्य मेरुं परिभ्रमतः संवत्सरात्मकं चक्रं५ देवानामहोरात्राभ्यां परिभ्रमति॥ ३०॥ तद‍्द्वीपस्याप्यधिपतिः प्रैयव्रतो वीतिहोत्रो नामैतस्यात्मजौ रमणकधातकिनामानौ६ वर्षपती नियुज्य स स्वयं पूर्वजवद्भगवत्कर्मशील एवास्ते॥ ३१॥ तद्वर्षपुरुषा भगवन्तं ब्रह्मरूपिणं सकर्मकेण कर्मणाऽऽराधयन्तीदं चोदाहरन्ति॥ ३२॥

evameva dadhimaṇḍodātparataḥ puṣkaradvīpastato dviguṇāyāmaḥ samantata upakalpitaḥ samānena svādūdakena samudreṇa bahirāvṛto yasmin bṛhatpuṣkaraṃ jvalanaśikhāmalakanakapatrāyutāyutaṃ bhagavataḥ kamalāsanasyādhyāsanaṃ parikalpitam|| 29||

अर्थ

इसी तरह मट्ठेके समुद्रसे आगे उसके चारों ओर उससे दुगुने विस्तारवाला पुष्करद्वीप है। वह चारों ओरसे अपने ही समान विस्तारवाले मीठे जलके समुद्रसे घिरा है। वहाँ अग्‍निकी शिखाके समान देदीप्यमान लाखों स्वर्णमय पंखड़ियोंवाला एक बहुत बड़ा पुष्कर (कमल) है, जो ब्रह्माजीका आसन माना जाता है॥ २९॥✎ 469 1975

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—दकसमुद्रेण।

    (मुद्रित पृष्ठ 666)
  2. २

    प्रा० पा०—पुष्कर ज्वलन०।

    (मुद्रित पृष्ठ 666)
  3. ३

    प्रा० पा०—सोत्तरो नामैक।

    (मुद्रित पृष्ठ 666)
  4. ४

    प्रा० पा०—प्राचीनयोर्वर्षयो०।

    (मुद्रित पृष्ठ 666)
  5. ५

    प्रा० पा०—चक्रमहोरात्राभ्यां।

    (मुद्रित पृष्ठ 666)
  6. ६

    प्रा० पा०—णकघातकनामानौ।

    (मुद्रित पृष्ठ 666)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #469 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #1975 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): इनपर → इसपर

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