श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.20.14

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

तद‍्द्वीपपतिः प्रैयव्रतो राजन् हिरण्यरेता नाम स्वं द्वीपं सप्तभ्यः स्वपुत्रेभ्यो यथाभागं विभज्य स्वयं तप आतिष्ठत वसुवसुदानदृढरुचिना१भिगुप्तस्तुत्यव्रतविविक्तवामदेवनामभ्यः॥ १४॥ तेषां वर्षेषु सीमागिरयो नद्यश्चाभिज्ञाताः२ सप्त सप्तैव चक्रश्‍चतुःशृङ्गः कपिलश्चित्रकूटो३ देवानीक ऊर्ध्वरोमा द्रविण इति रसकुल्या मधुकुल्या मित्रविन्दा श्रुतविन्दा देवगर्भा घृतच्युता मन्त्रमालेति ॥ १५॥ यासां पयोभिः कुशद्वीपौकसः कुशलकोविदाभियुक्तकुलकसंज्ञा भगवन्तं जातवेदसरूपिणं कर्मकौशलेन यजन्ते॥ १६॥

taddvīpapatiḥ praiyavrato rājan hiraṇyaretā nāma svaṃ dvīpaṃ saptabhyaḥ svaputrebhyo yathābhāgaṃ vibhajya svayaṃ tapa ātiṣṭhata vasuvasudānadṛḍharucinābhiguptastutyavrataviviktavāmadevanāmabhyaḥ|| 14||

अर्थ

राजन्! इस द्वीपके अधिपति प्रियव्रतपुत्र महाराज हिरण्यरेता थे। उन्होंने इसके सात विभाग करके उनमेंसे एक-एक अपने सात पुत्र वसु, वसुदान, दृढरुचि, नाभिगुप्त, स्तुत्यव्रत, विविक्त और वामदेवको दे दिया और स्वयं तप करने चले गये॥ १४॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—चिराभिगुप्त०।

    (मुद्रित पृष्ठ 664)
  2. २

    प्रा० पा०—ज्ञाताः सप्तैव चक्र०।

    (मुद्रित पृष्ठ 664)
  3. ३

    प्रा० पा०—पिलो वित्रकूटो।

    (मुद्रित पृष्ठ 664)

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