श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.2.9

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

शिष्या इमे भगवतः परितः पठन्ति

गायन्ति साम सरहस्यमजस्रमीशम्।

युष्मच्छिखाविलुलिताः सुमनोऽभिवृष्टीः

सर्वे भजन्त्यृषिगणा इव वेदशाखाः॥ ९

śiṣyā ime bhagavataḥ paritaḥ paṭhanti

gāyanti sāma sarahasyamajasramīśam|

yuṣmacchikhāvilulitāḥ sumano'bhivṛṣṭīḥ

sarve bhajantyṛṣigaṇā iva vedaśākhāḥ|| 9

अर्थ

[भौंरोंकी ओर देखकर—] भगवन्! तुम्हारे चारों ओर जो ये शिष्यगण अध्ययन कर रहे हैं, वे तो निरन्तर रहस्ययुक्त सामगान करते हुए मानो भगवान्‌की स्तुति कर रहे हैं और ऋषिगण जैसे वेदकी शाखाओंका अनुसरण करते हैं, उसी प्रकार ये सब तुम्हारी चोटीसे झड़े हुए पुष्पोंका सेवन कर रहे हैं॥ ९॥✎ 436

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #436 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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