॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.2.9
शिष्या इमे भगवतः परितः पठन्ति
गायन्ति साम सरहस्यमजस्रमीशम्।
युष्मच्छिखाविलुलिताः सुमनोऽभिवृष्टीः
सर्वे भजन्त्यृषिगणा इव वेदशाखाः॥ ९
śiṣyā ime bhagavataḥ paritaḥ paṭhanti
gāyanti sāma sarahasyamajasramīśam|
yuṣmacchikhāvilulitāḥ sumano'bhivṛṣṭīḥ
sarve bhajantyṛṣigaṇā iva vedaśākhāḥ|| 9
अर्थ
[भौंरोंकी ओर देखकर—] भगवन्! तुम्हारे चारों ओर जो ये शिष्यगण अध्ययन कर रहे हैं, वे तो निरन्तर रहस्ययुक्त सामगान करते हुए मानो भगवान्की स्तुति कर रहे हैं और ऋषिगण जैसे वेदकी शाखाओंका अनुसरण करते हैं, उसी प्रकार ये सब तुम्हारी चोटीसे झड़े हुए पुष्पोंका सेवन कर रहे हैं॥ ९॥✎ 436