॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.2.12
लोकं प्रदर्शय सुहृत्तम तावकं मे
यत्रत्य इत्थमुरसावयवावपूर्वौ।
अस्मद्विधस्य मनउन्नयनौ१ बिभर्ति
बह्वद्भुतं सर२सराससुधादि वक्त्रे॥ १२
lokaṃ pradarśaya suhṛttama tāvakaṃ me
yatratya itthamurasāvayavāvapūrvau|
asmadvidhasya manaünnayanau bibharti
bahvadbhutaṃ sarasarāsasudhādi vaktre|| 12
अर्थ
मित्रवर! मुझे तो तुम अपना देश दिखा दो, जहाँके निवासी अपने वक्षःस्थलपर ऐसे अद्भुत अवयव धारण करते हैं, जिन्होंने हमारे-जैसे प्राणियोंके चित्तोंको क्षुब्ध कर दिया है तथा मुखमें विचित्र हाव-भाव, सरसभाषण और अधरामृत-जैसी अनूठी वस्तुएँ रखते हैं॥ १२॥
टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—उन्नयनैर्बिभर्ति।
- २
प्रा० पा०—स्मरसराससुधादि।