श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.19.6

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

न वै स आत्माऽऽत्मवतां सुहृत्तमः

सक्तस्त्रिलोक्यां भगवान् वासुदेवः।

न स्त्रीकृतं कश्मलमश्नुवीत

न लक्ष्मणं चापि विहातुमर्हति॥ ६

na vai sa ātmā''tmavatāṃ suhṛttamaḥ

saktastrilokyāṃ bhagavān vāsudevaḥ|

na strīkṛtaṃ kaśmalamaśnuvīta

na lakṣmaṇaṃ cāpi vihātumarhati|| 6

अर्थ

आप धीर पुरुषोंके आत्मा* और प्रियतम भगवान् वासुदेव हैं; त्रिलोकीकी किसी भी वस्तुमें आपकी आसक्ति नहीं है। आप न तो सीताजीके लिये मोहको ही प्राप्त हो सकते हैं और न लक्ष्मणजीका त्याग ही कर सकते हैं†॥ ६॥

टिप्पणियाँ

  1. *

    यहाँ शंका होती है कि भगवान् तो सभीके आत्मा हैं, फिर यहाँ उन्हें आत्मवान् (धीर) पुरुषोंके ही आत्मा क्यों बताया गया? इसका कारण यही है कि सबके आत्मा होते हुए भी उन्हें केवल आत्मज्ञानी पुरुष ही अपने आत्मारूपसे अनुभव करते हैं—अन्य पुरुष नहीं। श्रुतिमें जहाँ-कहीं आत्मसाक्षात्कारकी बात आयी है, वहीं आत्मवेत्ताके लिये ‘धीर’ शब्दका प्रयोग किया है। जैसे ‘कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षत’ इति ‘नः शुश्रुम धीराणाम्’ इत्यादि। इसीलिये यहाँ भी भगवान्‌को आत्मवान् या धीर पुरुषका आत्मा बताया है।

    (मुद्रित पृष्ठ 657)
  2. †

    एक बार भगवान् श्रीराम एकान्तमें एक देवदूतसे बात कर रहे थे। उस समय लक्ष्मणजी पहरेपर थे और भगवान्‌की आज्ञा थी कि यदि इस समय कोई भीतर आवेगा तो वह मेरे हाथसे मारा जायगा। इतनेमें ही दुर्वासा मुनि चले आये और उन्होंने लक्ष्मणजीको अपने आनेकी सूचना देनेके लिये भीतर जानेको विवश किया। इससे अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार भगवान् बड़े असमंजसमें पड़ गये। तब वसिष्ठजीने कहा कि लक्ष्मणजीके प्राण न लेकर उन्हें त्याग देना चाहिये; क्योंकि अपने प्रियजनका त्याग मृत्युदण्डके समान ही है। इसीसे भगवान्‌ने उन्हें त्याग दिया।

    (मुद्रित पृष्ठ 657)

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