॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.19.25
प्राप्ता नृजातिं त्विह ये च जन्तवो
ज्ञानक्रियाद्रव्यकलापसम्भृताम् ।
न वै२ यतेरन्नपुनर्भवाय ते
भूयो वनौका इव यान्ति बन्धनम्॥ २५
prāptā nṛjātiṃ tviha ye ca jantavo
jñānakriyādravyakalāpasambhṛtām |
na vai yaterannapunarbhavāya te
bhūyo vanaukā iva yānti bandhanam|| 25
अर्थ
जिन जीवोंने इस भारतवर्षमें ज्ञान (विवेकबुद्धि), तदनुकूल कर्म तथा उस कर्मके उपयोगी द्रव्यादि सामग्रीसे सम्पन्न मनुष्यजन्म पाया है, वे यदि आवागमनके चक्रसे निकलनेका प्रयत्न नहीं करते, तो व्याधकी फाँसीसे छूटकर भी फलादिके लोभसे उसी वृक्षपर विहार करनेवाले वनवासी पक्षियोंके समान फिर बन्धनमें पड़ जाते हैं॥ २५॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—चेद्।