श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.19.14

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

यथैहिकामुष्मिककामलम्पटः

सुतेषु दारेषु धनेषु चिन्तयन्।

शङ्केत विद्वान् कुकलेवरात्ययाद्

यस्तस्य यत्नः श्रम एव केवलम्॥ १४

yathaihikāmuṣmikakāmalampaṭaḥ

suteṣu dāreṣu dhaneṣu cintayan|

śaṅketa vidvān kukalevarātyayād

yastasya yatnaḥ śrama eva kevalam|| 14

अर्थ

लौकिक और पारलौकिक भोगोंके लालची मूढ पुरुष जैसे पुत्र, स्त्री और धनकी चिन्ता करके मौतसे डरते हैं—उसी प्रकार यदि विद्वान्को भी इस निन्दनीय शरीरके छूटनेका भय ही बना रहा, तो उसका ज्ञानप्राप्तिके लिये किया हुआ सारा प्रयत्न केवल श्रम ही है॥ १४॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें