अजित! मुझे पानेके लिये इन्द्रिय-सुखके अभिलाषी ब्रह्मा और रुद्र आदि समस्त सुरासुरगण घोर तपस्या करते रहते हैं; किन्तु आपके चरण-कमलोंका आश्रय लेनेवाले भक्तके सिवा मुझे कोई पा नहीं सकता; क्योंकि मेरा मन तो आपमें ही लगा रहता है॥ २२॥
मत्प्राप्तयेऽजेशसुरासुरादय-
स्तप्यन्त उग्रं तप ऐन्द्रियेधियः।
ऋते भवत्पादपरायणान्न मां
विन्दन्त्यहं त्वद्धृदया यतोऽजित॥ २२
अजित! मुझे पानेके लिये इन्द्रिय-सुखके अभिलाषी ब्रह्मा और रुद्र आदि समस्त सुरासुरगण घोर तपस्या करते रहते हैं; किन्तु आपके चरण-कमलोंका आश्रय लेनेवाले भक्तके सिवा मुझे कोई पा नहीं सकता; क्योंकि मेरा मन तो आपमें ही लगा रहता है॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.18.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 653) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/18/22/