श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.18.16

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

अतीव सुललितगतिविलासविलसितरुचिरहासलेशावलोकलीलयाकिञ्चिदुत्तम्भितसुन्दरभ्रूमण्डलसुभगवदनारविन्दश्रिया रमां रमयन्‍निन्द्रियाणि रमयते॥ १६॥

atīva sulalitagativilāsavilasitarucirahāsaleśāvalokalīlayākiñciduttambhitasundarabhrūmaṇḍalasubhagavadanāravindaśriyā ramāṃ ramayannindriyāṇi ramayate|| 16||

अर्थ

भगवान् अपने सुललित गति-विलाससे सुशोभित मधुर-मधुर मन्द-मुसकानसे मनोहर लीलापूर्ण चारु चितवनसे कुछ उझके हुए सुन्दर भ्रूमण्डलकी छबीली छटाके द्वारा वदनारविन्दका राशि-राशि सौन्दर्य उँडेलकर सौन्दर्यदेवी श्रीलक्ष्मीको अत्यन्त आनन्दित करते और स्वयं भी आनन्दित होते रहते हैं॥ १६॥✎ 459 1613

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #459 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1613 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: काम-देवको → कामदेवको

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