श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.17.4

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

ततः सप्त ऋषयस्तत्प्रभावाभिज्ञा यां ननु तपस आत्यन्तिकी सिद्धिरेतावती भगवति सर्वात्मनि वासुदेवेऽनुपरतभक्तियोगलाभेनैवोपेक्षितान्यार्थात्मगतयो मुक्तिमिवागतां मुमुक्षव इव सबहुमानमद्यापि जटाजूटैरुद्वहन्ति॥ ३॥ ततोऽनेकसहस्रकोटिविमानानीकसङ्कुलदेवयानेनावतरन्तीन्दुमण्डलमावार्य ब्रह्मसदने निपतति॥ ४॥✎ 948

tato'nekasahasrakoṭivimānānīkasaṅkuladevayānenāvatarantīndumaṇḍalamāvārya brahmasadane nipatati|| 4||

अर्थ

वहाँसे गंगाजी करोड़ों विमानोंसे घिरे हुए आकाशमें होकर उतरती हैं और चन्द्रमण्डलको आप्लावित करती मेरुके शिखरपर ब्रह्मपुरीमें गिरती हैं॥ ४॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #948 शब्दोंके बीचका स्थान: जटाजूटैरुद्वहन्ति॥३॥ → जटाजूटैरुद्वहन्ति॥ ३॥

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