श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.17.15

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

नवस्वपि वर्षेषु भगवान्‍नारायणो महापुरुषः पुरुषाणां तदनुग्रहायात्मतत्त्वव्यूहेनात्मनाद्यापि३ संनिधीयते॥ १४॥ इलावृते तु भगवान् भव एक एव पुमान्‍न ह्यन्यस्तत्रापरो निर्विशति भवान्याः शापनिमित्तज्ञो यत्प्रवेक्ष्यतः स्त्रीभावस्तत्पश्चाद्वक्ष्यामि४ ॥ १५॥ भवानीनाथैः स्त्रीगणार्बुदसहस्रैरवरुध्यमानो५ भगवतश्‍चतुर्मूर्तेर्महापुरुषस्य तुरीयां तामसीं मूर्तिं प्रकृतिमात्मनः सङ्कर्षणसंज्ञामात्मसमाधिरूपेण संनिधाप्यैतदभिगृणन् भव उपधावति॥ १६॥

ilāvṛte tu bhagavān bhava eka eva pumānna hyanyastatrāparo nirviśati bhavānyāḥ śāpanimittajño yatpravekṣyataḥ strībhāvastatpaścādvakṣyāmi || 15||

अर्थ

इलावृतवर्षमें एकमात्र भगवान् शंकर ही पुरुष हैं। श्रीपार्वतीजीके शापको जाननेवाला कोई दूसरा पुरुष वहाँ प्रवेश नहीं करता; क्योंकि वहाँ जो जाता है, वही स्त्रीरूप हो जाता है। इस प्रसंगका हम आगे (नवम स्कन्धमें) वर्णन करेंगे॥ १५॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—व्यूहैरात्मनाद्यापि।

    (मुद्रित पृष्ठ 647)
  2. ४

    प्रा० पा०—पश्चाद्वक्ष्यामः।

    (मुद्रित पृष्ठ 647)
  3. ५

    प्रा० पा०—सहस्रैर्व्यवरुद्ध्ययमानो।

    (मुद्रित पृष्ठ 647)

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