॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.17.13
यत्र ह देवपतयः स्वैः स्वैर्गणनायकैर्विहितमहार्हणाः सर्वर्तुकुसुमस्तबकफलकिसलयश्रियाऽऽनम्यमानविटपलताविटपिभिरुपशुम्भमानरुचिरकाननाश्रमायतनवर्षगिरिद्रोणीषु तथा चामलजलाशयेषु विकचविविधनव वनरुहामोद१मुदितराजहंसजलकुक्कुटकारण्डवसारसचक्रवाकादिभिर्मधुकरनिकराकृतिभिरुपकूजितेषु जलक्रीडादिभिर्विचित्रविनोदैः सुललितसुरसुन्दरीणां कामकलिलविलासहासलीलावलोका२कृष्टमनोदृष्टयः स्वैरं विहरन्ति॥ १३॥
yatra ha devapatayaḥ svaiḥ svairgaṇanāyakairvihitamahārhaṇāḥ sarvartukusumastabakaphalakisalayaśriyā''namyamānaviṭapalatāviṭapibhirupaśumbhamānarucirakānanāśramāyatanavarṣagiridroṇīṣu tathā cāmalajalāśayeṣu vikacavividhanava vanaruhāmodamuditarājahaṃsajalakukkuṭakāraṇḍavasārasacakravākādibhirmadhukaranikarākṛtibhirupakūjiteṣu jalakrīḍādibhirvicitravinodaiḥ sulalitasurasundarīṇāṃ kāmakalilavilāsahāsalīlāvalokākṛṣṭamanodṛṣṭayaḥ svairaṃ viharanti|| 13||
अर्थ
वहाँ ऐसे आश्रम, भवन और वर्ष, पर्वतोंकी घाटियाँ हैं जिनके सुन्दर वन-उपवन सभी ऋतुओंके फूलोंके गुच्छे, फल और नूतन पल्लवोंकी शोभाके भारसे झुकी हुई डालियों और लताओंवाले वृक्षोंसे सुशोभित हैं; वहाँ निर्मल जलसे भरे हुए ऐसे जलाशय भी हैं; जिनमें तरह-तरहके नूतन कमल खिले रहते हैं और उन कमलोंकी सुगन्धसे प्रमुदित होकर राजहंस, जलमुर्ग, कारण्डव, सारस और चकवा आदि पक्षी तरह-तरहकी बोली बोलते तथा विभिन्न जातिके मतवाले भौंरे मधुर-मधुर गुंजार करते रहते हैं। इन आश्रमों, भवनों, घाटियों तथा जलाशयोंमें वहाँके देवेश्वरगण परम सुन्दरी देवांगनाओंके साथ उनके कामोन्मादसूचक हास-विलास और लीला-कटाक्षोंसे मन और नेत्रोंके आकृष्ट हो जानेके कारण जलक्रीडादि नाना प्रकारके खेल करते हुए स्वच्छन्द विहार करते हैं तथा उनके प्रधान-प्रधान अनुचरगण अनेक प्रकारकी सामग्रियोंसे उनका आदर-सत्कार करते रहते हैं॥ १३॥
टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—मोदमदमुदितराजहंसकलहंसजल०।
- २
प्रा० पा०—लोकाः स्वैरं विहरन्ति।