श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.16.12

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

एवं दक्षिणेनेलावृतं निषधो हेमकूटो हिमालय इति प्रागायता यथा नीलादयोऽयुतयोजनोत्सेधा हरिवर्षकिम्पुरुषभारतानां यथासंख्यम्॥ ९॥ तथैवेलावृतमपरेण पूर्वेण च माल्यवद्गन्धमादनावानीलनिषधायतौ द्विसहस्रं पप्रथतुः केतुमालभद्राश्‍वयोः सीमानं विदधाते॥ १०॥ मन्दरो मेरुमन्दरः सुपार्श्वः कुमुद इत्ययुतयोजनविस्तारोन्‍नाहा मेरोश्‍चतुर्दिशमवष्टम्भगिरय उपक्लृप्ताः॥ ११॥ चतुर्ष्वेतेषु चूतजम्बूकदम्बन्यग्रोधाश्‍चत्वारः पादपप्रवराः पर्वतकेतव इवाधिसहस्रयोजनोन्‍नाहास्तावद् विटपविततयः शतयोजनपरिणाहाः॥ १२॥ ह्रदाश्‍चत्वारः पयोमध्विक्षुरसमृष्टजला यद् उपस्पर्शिन उपदेवगणा योगैश्‍वर्याणि स्वाभाविकानि भरतर्षभ धारयन्ति॥ १३॥ देवोद्यानानि च भवन्ति चत्वारि नन्दनं चैत्ररथं वैभ्राजकं सर्वतोभद्रमिति॥ १४॥ येष्वमरपरिवृढाः सह सुरललनाललामयूथपतय उपदेवगणैरुपगीयमानमहिमानः किल विहरन्ति॥ १५॥

caturṣveteṣu cūtajambūkadambanyagrodhāścatvāraḥ pādapapravarāḥ parvataketava ivādhisahasrayojanonnāhāstāvad viṭapavitatayaḥ śatayojanapariṇāhāḥ|| 12||

अर्थ

इन चारोंके ऊपर इनकी ध्वजाओंके समान क्रमशः आम, जामुन, कदम्ब और बड़के चार पेड़ हैं। इनमेंसे प्रत्येक ग्यारह सौ योजन ऊँचा है और इतना ही इनकी शाखाओंका विस्तार है। इनकी मोटाई सौ-सौ योजन है॥ १२॥

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